एक बीज ….
शब्द है वह …
पनपता है ,धरती के दिल को चीरता हुआ दिख जाता है ,
कभी शब्दोंकी बेले झूल जाती है ,
कभी उस पर नज़्मके फूल खिल जाते है ….
कभी टूटे पत्ते पर बैठकर उड़ जाते है हवा की आवाज बन ,
कभी नावके पस्तुल पर बैठ लहरोंसे अठखेलियाँ कर लेते है ….
सागरकी मौजो पर सवार हो समुन्दरके सूर बन
एक नगमा गुनगुनाते है ….
कभी कोयल की हुक बन कभी
कुत्तेका दर्द बन सुनी रातमें भय घोल जाते है …
कभी अल्लाह की आजान बन कभी मन्दिरमें आरती बन ,
कभी भक्तों के दोहोंमें निराकार दुआ बन नजर जाता है …
कभी रुदालीके गान में करुनाकी दुहाई दे जाता है ….
शब्द शब्द जो आवाजसे जुड़ जाता है ,
दर्द कसक की अठखेलियों में या प्यार के गुलमें …
कभी मौन बनकर भी निखर जाता है ….


























शब्द ही ब्रह्म हैं
शब्द ही क्रांति है
शब्द ही मित्र है
शब्द ही ब्राहन्ती है
लाजवाब रचना