अब साहित्य के नौ रससे रंगी ये बारिश …..
शांत रस बनकर टिप टिप कर बरस जाती है
श्रृंगार रस बन सज जाती है हरी चद्दरसी धरती का आँचल बन …
गरज बादल की कोई लड़ाकेकी वीर रस की झलक दे जाती है
छिपकर किसी कौनेसे सूरज की नटखट किरन
बादल के केनवास पर मेघधनुषका अद्भुत नज़ारा दे जाती है …..
बचपन गूंजता है गलियोंमें शहर की हास्य रस बनकर
छापक छै करता बचपन नहाता है जब भरपूर सावनमें ….
तोड़ती है किनारों का बंधन ये बहती नदी
सैलाब बनकर इंसानकी आँखोंमें करुण रसमें भीगे अश्क ले आती है …..
सावनके साथ बिजली मेहमान बनकर आती है जमीं पर
उसकी कड़क फिजाओं में भयानक रससे दिल को देहलाती है …..
गिले यौवनको तकती हुई काम लोलुप आँखों में
बीभत्स रस की शर्मनाक छाया भी कहीं नज़र आती है
इस गुस्ताखी पर बादल के जोरों के टकराने में
रौद्र रस की गरज सुनाई देती है …..
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bahut khoob preeti ji “बचपन गूंजता है गलियोंमें शहर की हास्य रस बनकर
छापक छै करता बचपन नहाता है जब भरपूर सावनमें ” yeh panktiyaan bachpan ki khoobsurat yaadein tazaa karti hai