कोई बचाओ मुझे,
रोको उसे,
हाँ यही है वो,
बस अब और नहीं,
अब फिर से नहीं,
अब और सहा नहीं जाता,
क्या कोई भी
नहीं इस विशाल संसार में
जो कर सके रक्षा मेरी उससे,
क्या कोई भी नहीं इस
जाहाँ में जो
मुक्त करा दे मुझे
उसके शिकंजे से,
कोई तो होगा,
क्या कहीं किसी को सुनाई
नहीं देती मेरी करुण पुकार,
क्या फटती नहीं छाती
किसी वीर पुरुष की
सुन कर मेरी दहाड़,
मैं पूछती हूँ
कोई तो होगा जो
अंत करेगा उसका,
कोई तो होगा जो
ले जाएगा दूर मुझे इस सन्नाटे से,
इस निर्जन एकांत से,
के बस
अब और नहीं सहा जाता
शोर इस सन्नाटे का!
के जीना चाहती हूँ मैं भी
तनिक औरों की ही तरह,
लगाकर पंख आशाओं व् उमीदों के,
उड़ना चाहती हूँ इस गगन विशाल में,
नहीं जीना इस निराशावादी
संसार में,
जहाँ रोका जाता है चार
सपने संजोने पर भी कहकर यह
की पछताओगी,
रोओगी बाद में,
भर लेना चाहती हूँ झोली अपनी
उन छोटी-बड़ी खुशियों से,
के आएगा कभी तो वो
जो ले जाएगा मुझे दूर,
बहुत दूर,
वो किसी खुशियों भरे संसार में………
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