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बाहों के झूले जब तरस गए आज

August 21st, 2010 by padmsingh.
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ये रचना अपनी छोटी सी बेटी के लिए लिखी थी…. तीन महीने की थी जब…… दो साल दूर रही मुझसे …..

बाँहों के झूले जब तरस गए आज
तो आँखों से बदल कुछ बरस गए आज
बरस कई बीते एक नन्ही सी जान
उतारी ज्यों अंधियारे जीवन में चाँद
मगन हुए तन मन और तृप्त हुए प्राण
जैसे मन वीणा पर गुम्फित एक तान
भीगे जब स्वर टूटे सपनों के साज़
तो आँखों से बदल कुछ बरस गए आज

मैंने संजो रखा है कोयल की कूक
आंगन के कोने में जाड़े की धूप
अंजुली भर अम्बियाँ एक कागज़ की नाव
मेले के मंहगे खिलौने के भाव
चिड़ियों के पर, गीली माटी के खेल
बचपन के झगड़े और झगड़ों के मेल
आई जब रन झुन पयजनियों की याद
तो आँखों से बदल कुछ बरस गए आज

कैसे पुकारूँ तुम्हे ओ प्यारी बिटिया
तुम पढ़ भी नहीं सकती मेरी आंसू भरी चिठिया
सावन भी बरसे और मन मेरा तरसे
क्यों विधि ने सुख छीन लिया मेरे ही घर से
जब धुंध सा घिर आया एकाकी पन आज
तो आँखों से बदल कुछ बरस गए आज….

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