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पथिक

June 17th, 2010 by Antonymous_expressions.

मैं एक राही हूँ , चलता चला जाता हूँ .

हवा के साथ बहता हूँ , स्थिरता में नीरसता पाता हूँ मैं .

कश्ती का पाल हूँ मैं , जैसे ढालो ढल जाता हूँ मैं .

ज़माना कहता है व्यवहारिक बनो , ये सुन कर सोचने लग जाता हूँ मैं .

कुछ देर के लिए जो आँखें खोलता हूँ , मंज़र देख कर घबराता हूँ मैं .

दुनिया की इन तमाम रंजिशों में , खुद को हारा हुआ पाता हूँ मैं .

फिर सोचता हूँ क्यूँ मैं बनूँ समझदार , क्यूँ करूँ इन्सान के साथ जानवर सा व्यवहार ?

बस यही सोच कर खुद को समझाता हूँ मैं . दिल की सुन कर ही दिल का सुकून पाता हूँ में .

और बस अपनी ही धुन में गाता हूँ मैं ,

राही हूँ , हवा के साथ बहता चला जाता हूँ मैं .

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3 Responses to “पथिक”

  1. hindikavi says:

    वाह खूबसूरत ख्याल
    समाज में ऐसे राहगीरों की बहुत ज़रूरत है

  2. rahul says:

    life is about moving on ..well written

  3. Sanjeev says:

    Very nice heart Touching Words.

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