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तुम तो नहीं थे (कविता)

August 21st, 2010 by padmsingh.
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रात मेरे अंतरण को
स्वप्न सा छू कर गये
तुम तो नहीं थे ?
पुष्प की डाली ने हिल कर
जो इशारा सा किया
तुम तो नहीं थे ?
मै समझता हूँ
तुम्ही थे….
तुम मेरे अस्तित्व के
चहुँ ऑर घेरा सा बना कर
लूट कर सम्पूर्ण मेरा
ले चलो न..
पोंछ डालो
मिटा दो मन के बवंडर
इस पथिक को
बैठ जाने दो
किसी दरिया किनारे
आचमन कर लूँ
ठहर कर
छाँव ले लूँ
छोड़ दूँ सब मान्यताएं
तोड़ दूँ बंधन पुराने
नग्न हो जाऊं
धरा से गगन तक
फिर कूद जाऊं
और बह जाऊं
अनंतिम मौज में

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