तुझ तक कोई ख़त कभी पंहुचा भी न सका
जब जब तुम मिले होठों को सी लिया मैंने
चेहरे की बैचैनी मगर तुझसे छुपा भी न सका
मेरा प्यार बंद रहा लिफाफों में खतों के साथ
तेरी ही दौलत थी और तुझ पर लुटा भी न सका
तेरी ही यादों की खुशबु है मेरी शायरी के गुलशन में
कोई फूल तेरी जुल्फों में मगर सजा भी न सका
मेरे रंज ओ गम की दवा करता भी कोन “तोमर”
तेरे प्यार की निशानी थे ये जख्म किसी को दिखा भी न सका
डॉ. विकास तोमर
5 apr 10
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ख़त, 4.3 out of 10 based on 8 ratings


























क्या बात है डॉक्टर साब
लाजवाब शायरी मज़ा आ गया
बहुत खूब
wow..haven’t read such a beautiful composition in a long long time..awesome sir !!
तेरे प्यार की निशानी थे ये जख्म किसी को दिखा भी न सका….awesum…definitely better dan the 4.3 rating!