ग़ज़ल ” कातिल “
जबसे कातिलों के शहर में आकर हम रहने लगे है
बेगुनाह होते हुए भी लोग हमें कातिल समझने लगे है
एक अंजाना सा भय है एक अनजानी सी दहशत
ऑंखें चुराकर लोग हमसे अब निकलने लगे है
नहीं जलती है शमां नहीं होती है रोशनी मेरी महफ़िल में
कदम -दर- कदम पैरों के निशान मिटने लगे हैं
आने लगी हर सहर बनकर मुस्किल एक डगर
घर का रुख देख मेरे लोगों के कदम रुकने लगे हैं
” उपेन्द्र ” नजरें नहीं मिलती हर शक्श अब सहमा हुआ है
महफ़िलें हो गयी सुनी लोग महफ़िलों उठने लगे हैं ।।
उपेन्द्र


























bahut badiya upendra..the flow of the ghazal..