कब तक ये संत्रास रहेगा
कब तक ये वातास बहेगा
धूप न मिल पाई बिरवे को
निर्मम कारा के गह्वर में
प्यास न मिट पाई मरुथल की
धूल धुंध फैली अंतर में
सरसिज की आहों में कब तक
पतझर का आभास रहेगा………..
आँखों को चुभने लगता है
पलकों का सुकुमार बिछौना
मन की तृषा भटकती ऐसे
जैसे आकुल हो मृग छौना
आखिर कब तक इन राहों को
मंज़िल का आभास रहेगा………….
विधि के हाथों जीवन की भी
डोर छोर पुरजोर बंधी है
जहाँ राह ले जाए राही के
सपनों की डोर बंधी है
राजा राम संग सीता को
मिलता ही वनवास रहेगा…

























