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इसका क्या कोई पार नहीं ?

June 22nd, 2010 by rohit.

रुपया पैसा धन और दौलत
जीवन का क्या बस सार यही
ये चक्रवात धर्म अर्थ काम का
इसका क्या कोई पार नहीं ?

क्या जीवन बस पाना ही है
अनवरत चले जाना ही है,
ये अंतहीन पगडण्डी जो
इसका क्या कोई पार नहीं ?

क्या समय नहीं थोडा रुकने का
और रुक के सुस्ताने का,
बिन सोचे जिस राह चले हम
इसका क्या कोई पार नहीं ?

तो तनिक रुको, रुक कर सोचो
क्या राह यही मंजिल की है,
ये प्रश्न और वोह राह तेरी
जीवन का है बस सार यही ||

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4 Responses to “इसका क्या कोई पार नहीं ?”

  1. hindikavi says:

    वाह उत्तम रचना
    बेहतरीन लेखनी

  2. deepak says:

    awesome stuff

  3. pankajsharma says:

    BHAUT KOOB JANAAB

  4. क्या जीवन बस पाना ही है
    अनवरत चले जाना ही है,
    ये अंतहीन पगडण्डी जो
    इसका क्या कोई पार नहीं ?

    bahut accha varnan kiya hai, nice thought

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